वो दरिया फिर दरिया नहीं, समंदर कहलाता हैं..

वो दरिया फिर दरिया नहीं, समंदर कहलाता हैं,
जिसने ली है तेरी दुआ, वो अकबर कहलाता है,

वली, वली ही नहीं, नज़र-ए-इनायत जो तेरी ना हो,
ये वो दर है जहां औलियाओं ने ज़र्फ़ पाया है,

इक नज़र, नज़र-ए-क़रम यहां भी मेरे ख्वाजा,
इस फ़कीर ने जाने कब से दामन फैलाया है,

तू फेर ले नज़र या करदें क़रम ये हुक़ूमत तेरी हैं,
मैं तो हूँ गरीब, बंदानवाज़ी की बारी अब तेरी है।

#अमीरहाशमी की कलम से…