Sukhanwar Hi Kya

“सुखनवर ही क्या”

  • ये तू ना हुआ तो तेरा शहर ही सही शब्-ए-वादा,
    आज दर्द में है आसमां, जो दिल-ए-यार ग़म में है

 

  • शब-ए-हिज़्र, जारी-ए-सफर करता नहीं है दिल यूँ बेसाख़्ता,
    वो शाम-ए-बहार, वो मंज़र में आब, हर वक़्त नज़र में है

 

  • कोई ग़म ना रहा जो सीने में उतरकर देता हो सिसकियाँ,
    बस, मोतियों का खिलाना, वो शाम-ए-समन्दर मंज़र में है

 

  • वो इश्क़ ही क्या जिसमें ना हों हिज़्र, ना दर्द-ए-तवील,
    मौसम तो हो मगर, ना हो इरादा-ए-खुदखुशी तो क्या

 

  • अदा-ए-जफ़ा, इरादा-ए-ख़ुदक़त्ल, नगवारा हों ज़माना,
    शब्-ओ-रोज़ ख्वाहिशें फना भी ना हो, वो दिल भी क्या

 

  • फ़ैज़ मांगे “अमीर” ना मांगे आराम-ए-दर्द-ओ-सुखन,
    ज़माना ना कहे क़ातिल तुझको तो सुखनवर ही क्या”

 

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